दिल्ली

समलैंगिक शादी के लिए गाजे-बाजे संग निकलीं बारात

नई दिल्ली. निकेश ऊषा पुष्करण और सोनू एमएस कोच्चि, केरल के रहने वाले समलैंगिक पार्टनर हैं. दोनों ने जुलाई 2018 में शादी की थी. वह भी चुपके-चुपके क्योंकि उन्हें जानने-पहचानने वाले उनके रिश्ते को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे. लिहाजा, नई कमीजें और परंपरागत धोतियों में तैयार होकर दोनों जब त्रिशूर गुरुवयूर मंदिर शादी के लिए पहुंचे, तब उनके साथ सिर्फ चंद दोस्त ही थे. उन्हीं की मौजूदगी में उन्होंने एक-दूसरे को अंगूठियां पहनाईं. फिर चुपचाप मंदिर से बाहर निकलकर पार्किंग स्थल पर एक-दूसरे के गले में मालाएं डालीं और घर रवाना हो गए. माता-पिता को भी दोनों ने बाद में ही अपनी शादी के बारे में बताया. फेसबुक पर शादी की तस्वीर डाली तो उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं. तब तक अदालत ने समलैंगिक संबंधों को कानूनी दर्जा दिया नहीं था. इसलिए निकेश और सोनू के पास पुलिस की सुरक्षा भी नहीं थी. इस सब के कारण उन्हें करीब एक साल तक अपना रिश्ता और शादी बाहर वालों से छिपाकर रखना पड़ी.

काफी कुछ इसी तरह के हालात का सामना कोलकाता के सुचंद्र दास और श्री मुखर्जी को करना पड़ा, साल 2015 में. उन्होंने अपने दोस्त के अपार्टमेंट में परंपरागत बंगाली रीति-रिवाज के साथ शादी की थी क्योंकि वे कोई शादी हॉल बुक नहीं कर सके थे. डर था कि वहां किसी तरह का बखेड़ा न खड़ा हो जाए. दास कहते हैं, ‘हम ऐसे समाज में रहते हैं, जहां आज भी इस तरह के रिश्ते को स्वीकार नहीं किया जाता. जबकि समझने की जरूरत है कि इस तरह का संग-साथ भी होता है. रिश्ते होते हैं ओर शादियां भी.’ हालांकि दास और मुखर्जी के सामने निकेश व सोनू की तुलना में कुछ कम मुश्किलात आईं. उन्हें तुलनात्मक रूप से दोस्त, यार, परिचितों का समर्थन भी कुछ ज्यादा मिला.

लेकिन इस तरह कहानियां अब पुरानी हो चली हैं. भारतीय समाज के बदलते स्वरूप की कुछ मिसाल देखिए. हैदराबाद में अभी कुछ समय पहले ही सुप्रियो चक्रबर्ती और अभय डांग ने भी समलैंगिक शादी की है. इसमें बाकायदा शादी हॉल बुक किया गया. मेंहदी, संगीत की रस्में हुईं, और 100 मेहमान भी इसमें शामिल हुए. हालांकि जब ये लोग शादी की तैयारियां कर रहे थे, तो डर इनके मन में भी था. इनके दोस्त और सहयोगी भी आशंकित थे. लेकिन जैसा कि चक्रबर्ती कहते हैं, ‘हैदराबाद चूंकि तरक्कीपसंद शहर है, तो हमारी ज्यादातर आशंकाएं गलत ही साबित हुईं.’

इसी हफ्ते महाराष्ट्र के नागपुर में दो महिलाओं की रिंग सेरेमनी हुई है. इसमें करीब 150 मेहमान शामिल हुए. इसमें भी जमकर नाच-गाना और मौज-मस्ती हुई. बिना किसी झिझक, आशंका या डर के. महाराष्ट्र के ही यवतमाल में ऋषिकेश सठवाने और उनके वियतनामी पार्टनर ने 2017 में जब शादी की, तो वह भी इसी तरह अधिकांश लोगों की मंजूरी और सहमति से राजी-खुशी हुई. बल्कि ऋषिकेश तो याद करते हैं, ‘मेरी शादी में कुछ लोगों की प्रतिक्रिया तो मेरे माता-पिता के साथ ऐसी थी… अरे वाह! हमने सुना है, आपके बेटे ने शादी कर ली. हमें क्यूं नहीं बुलाया शादी में?’

समाज में बदलाव की इस बयार को केरल के पहले समलैंगिक पार्टनर निकेश और सोनू भी महसूस कर रहे हैं. निकेश कहते हैं, ‘हमें खुशी है कि हम समाज में इस तरह के बदलाव के अगुवा बने. इससे हमारे जैसे कई लोगों को मदद मिली. लेकिन हम भी, अपने माता-पिता, दोस्तों-यारों और जान-पहचान वालों की मौजूदगी में अब फिर शादी करना चाहते हैं.

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