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बेटी की आंखों की रोशनी बनी प्रेरणा, अमृतसर के कृपा अरोड़ा ने 600 जरूरतमंदों तक पहुंचाई उम्मीद की किरण

अमृतसर। कभी अपनी बेटी की आंखों की रोशनी को लेकर चिंतित एक पिता आज सैकड़ों जरूरतमंद लोगों के जीवन में उम्मीद की नई किरण जगाने का काम कर रहे हैं। अमृतसर के कटरा कर्म सिंह निवासी 86 वर्षीय कृपा अरोड़ा ने अपने व्यक्तिगत अनुभव को समाजसेवा का मिशन बना लिया। उनके नेत्रदान जागरूकता अभियान से अब तक करीब 600 जरूरतमंद लोगों को कॉर्निया प्रत्यारोपण के लिए मदद मिल चुकी है।

कृपा अरोड़ा की बेटी की आंख का कॉर्निया खराब हो गया था। इलाज के दौरान परिवार को उपयुक्त कॉर्निया मिलने के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। करीब एक वर्ष बाद लुधियाना के एक आई बैंक से कॉर्निया मिलने पर प्रत्यारोपण संभव हो सका और बेटी की आंखों की रोशनी वापस आ गई।

यह अनुभव अरोड़ा परिवार के लिए राहत लेकर आया, लेकिन कृपा अरोड़ा के मन में एक बड़ा सवाल भी छोड़ गया—जो मरीज समय पर कॉर्निया नहीं प्राप्त कर पाते, उनका क्या होता होगा?

2009 में शुरू की नेत्रदान जागरूकता मुहिम

इसी अनुभव ने कृपा अरोड़ा को नेत्रदान के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए प्रेरित किया। वर्ष 2009 में उन्होंने नेत्रदान जागरूकता अभियान की शुरुआत की। शुरुआत में वह लोगों को नेत्रदान के महत्व के बारे में बताते थे और परिवारों को मृत्यु के बाद आंखों के दान के लिए प्रेरित करते थे।

धीरे-धीरे यह प्रयास एक व्यापक सामाजिक अभियान का रूप लेता गया। वर्षों की मेहनत के बाद उनके प्रयासों से सैकड़ों जरूरतमंद मरीजों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की प्रक्रिया में सहायता मिली।

600 लोगों के जीवन में पहुंची नई उम्मीद

कृपा अरोड़ा के अनुसार, अब तक उनके अभियान के माध्यम से लगभग 600 जरूरतमंद लोगों को कॉर्निया प्रत्यारोपण में मदद मिल चुकी है। वह मानते हैं कि बेटी के इलाज के दौरान परिवार ने जिस इंतजार और चिंता का सामना किया, उसी ने उन्हें दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित किया।

उनका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नेत्रदान के प्रति जागरूकता बढ़े और जरूरतमंद मरीजों को समय पर सहायता मिल सके।

नेत्रदान को लेकर जागरूकता जरूरी

कृपा अरोड़ा लोगों से अपील करते हैं कि नेत्रदान का संकल्प लेने के बाद अपने परिवार के सदस्यों को भी इसकी जानकारी जरूर दें। उनका कहना है कि सही समय पर परिवार की ओर से संबंधित आई बैंक या नेत्रदान केंद्र को सूचना मिलना बेहद महत्वपूर्ण होता है।

वह लोगों को यह संदेश देते हैं कि किसी व्यक्ति के निधन के बाद भी उसका नेत्रदान किसी जरूरतमंद के जीवन में नई उम्मीद लेकर आ सकता है।

86 साल की उम्र में भी जारी है सेवा का सफर

उम्र के इस पड़ाव पर भी कृपा अरोड़ा की सामाजिक सेवा जारी है। वह लगातार लोगों को नेत्रदान के महत्व के बारे में जागरूक कर रहे हैं और अधिक से अधिक परिवारों को इस नेक पहल से जुड़ने के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

कृपा अरोड़ा की कहानी यह बताती है कि जीवन का एक कठिन अनुभव भी समाज के लिए सकारात्मक बदलाव की शुरुआत बन सकता है। बेटी की आंखों की रोशनी वापस आने से शुरू हुआ उनका सफर आज सैकड़ों लोगों के लिए उम्मीद और प्रेरणा का संदेश बन चुका है।

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