क्या दुनिया का कोई भी नोट नैनो जीपीएस(GPS)
इन दिनों कौन बनेगा करोड़पति के नए सीजन का एक प्रोमो चर्चा का विषय हुआ है. जिसमें वो अपने सामने बैठी एक प्रतियोगी से 2000 रुपए के नोट में जीपीएस (GPS) संबंधी जवाब को गलत ठहराते हैं. हम ये जानेंगे कि क्या दुनिया में कहीं भी करेंसी नोटों में इस तरह का फीचर है और ये जीपीएस होता क्या है.
कौन बनेगा करोड़पति का नया सीजन शुरू होने वाला है. इसके नए प्रोमो ने देश में 2000 रुपए के नोट को ही चर्चा मे नहीं ला दिया है बल्कि ये सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या नोट करेंसी में नैनो जीपीएस तकनीक होती है.
ये भी बड़ा सवाल है कि भारत में ये चर्चाएं इतने बड़े पैमाने पर कैसे शुरू हुईं. क्या दुनिया में कभी किसी ऐसे नोट को बनाने पर विचार किया गया, जिसमें नैनो जीपीएस तकनीक लगाने पर विचार हुआ. साथ में ये सवाल भी ये जीपीएस प्रणाली है क्या, इसका इस्तेमाल कहां कहां होता है.
जब 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपए के नोटबंदी की घोषणा की तो ये बताया कि हम नए नोट लाएंगे. उससे कुछ समय बाद 2000 रुपए के नए नोट को लाने की बात आधिकारिक तौर पर सामने आई.
इस नोट की तस्वीर जैसे ही पहली बार जारी हुई, उसके बाद बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया से लेकर टीवी की खबरों तक ये चर्चा जोर पकड़ने लगी कि 2000 का नया नोट नैनो जीपीएस तकनीक से लैस होगा.
कहा गया कि इस तकनीक की वजह से इन नोटों को कोई कभी बड़े पैमाने पर छिपाकर नहीं रख सकेगा. इसमें लगी जीपीएस प्रणाली से हमेशा ये पता लग जाएगा कि किसी ने इसे बड़े पैमाने पर छिपाया तो नहीं है. हालांकि बाद में ये सारी चर्चाएं टांय टांय फिस्स हो गईं.
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया से लेकर सरकार तक को कहना पड़ा कि 2000 रुपए के नोट में ऐसी किसी तकनीक का इस्तेमाल नहीं होने जा रहा है. ना ही ऐसा होना संभव है
क्या कहते हैं एक्सपर्ट
एक्सपर्ट का कहना है कि ऐसी किसी नैनो जीपीएस का अब तक ईजाद नहीं हुआ है, जो कागज के नोटों में फिक्स की जा सके. इसका इस्तेमाल बड़ी संख्या में इतना आसान तो नहीं है. हालांकि जीपीएस चिप का इस्तेमाल तमाम देशों में मवेशियों से लेकर तमाम चीजों की ट्रेकिंग में होता है लेकिन कागज के नोटों में तो इसके इस्तेमाल के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता है.
कहीं नैनो जीपीएस का इस्तेमाल करेंसी में हुआ
नहीं. अब तक तो बिल्कुल नहीं. दुनिया में अब कागज की करेंसी के 350 सालों से अधिक के इतिहास में अब तक ना तो इसके बारे में सोचा गया और न ही हुआ.
वैसे दुनिया का पहला कागज का नोट चीन में सातवीं सदी में तेंग और सांग डायनेस्टी के शासनकाल में शुरू हुआ लेकिन बैकनोट की शुरुआत यूरोप में 1661 में हुई. और ऐसी तकनीक पर दुनिया में कोई भी देश किसी भी तरह काम नहीं कर रहा.
क्योंकि माना जा रहा है कि कागज की करेंसी धीरे धीरे खत्म हो जाएगी, उसकी जगह डिजिटल करेंसी ले लेगी. कई देशों ने तो अपने यहां करेंसी के नोटों का उत्पादन ही बंद कर दिया.
जीपीएस तकनीक क्या होती है किस काम आती है
जीपीएस का मतलब है ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम, मूल तौर पर ये आकाश में घूम रहे सेटेलाइट के जरिए काम करता है, लेकिन इसके लिए एक दो नहीं बल्कि 24 सेटेलाइट के समूह की मदद ली जाती है. . मूलतौर पर अब के दौर में ये नेवीगेशन, पोजिशनिंग, लोकेशन सर्च आदि का पता लगाने में हो रहा है.
पहली बार जीपीएस का इस्तेमाल कब हुआ
पहली बार जीपीएस का इस्तेमाल अमेरिका सेना ने 1960 के दशक में अपने कामों के लिए किया लेकिन 80 के दशक तक इसका इस्तेमाल कामर्शियल और सिविल सेक्टर में शुरू हो गया. अब इसका प्रचुर इस्तेमाल हवाई जहाजों, रडारों, मोबाइल, आटोमोबाइल, वाचेज, जीआईएस उपकरणों आदि में होता है.
कैसे काम करता है
इसमें पृथ्वी से ऊपर घूमते हुए उपग्रह सिगनल भेजते हैं और पृथ्वी पर रिसीवर उसको ग्रहण करता है, उसके जरिए उसकी लोकेशन, स्पीड या कार्यकलाप का पता लग जाता है. लेकिन ये सिगनल कई उपग्रहों द्वारा भेजे जाते हैं. फिर रिसीवर उन्हें रिसीव करके उन संकेतों को पढ़ता है और जब ऐसा होता है संबंधित उपकरण नेवीगेशन, पोजिशन, स्पीड, लोकेशन आदि सब कुछ बताने लगते हैं.
वैसे इस सिस्टम की बेहतर गणना के लिए कम से कम चार सेटेलाइट का इस्तेमाल तो होता ही है. इसी से ये भी पता चल जाता है कि आब्जेक्ट कहां है, उसकी दूरी कितनी है, उसकी गति कितनी है और वो तय गंत्वय तक कब तक पहुंच पाएगा.
अब किन चीजों में इस्तेमाल ज्यादा होता है
– लोकेशन वाले यंत्रों में
– मैप बनाने में
– आब्जेक्ट मानिटरिंग में
– गेमिंग और पोजिशनिंग में
– मवेशियों के मूवमेंट पर नजर रखने में
– हवाई यातायात
– फिटनेस की गणना में





