लखनऊ

पंजाबी लिपि की उत्पत्ति विषयक एक संगोष्ठी !

लखनऊ -:  उत्तर प्रदेश पंजाबी अकादमी, लखनऊ के तत्वावधान में दिनाँक 15 जून, 2026 दिन सोमवार को अकादमी कार्यालय, इन्दिरा भवन, अशोक मार्ग, लखनऊ में अपराह्न से ‘‘पंजाबी लिपि की उत्पत्ति‘‘ विषयक एक संगोष्ठी का आयोजन सफलतापूर्वक किया गया। उक्त संगोष्ठी में वरिष्ठ पंजाबी विद्वान/चिन्तक डाॅ० सत्येन्द्र पाल सिंह, वरिष्ठ पंजाबी विद्वान/ लेखक/चिन्तक स० नरेन्द्र सिंह मोंगा, नवयुग कन्या महाविद्यालय के दर्शनशास्त्र विभाग की अध्यक्ष मेजर (डाॅ०) मनमीत कौर सोढी तथा युवा पंजाबी विदुषी सुश्री गुरमीत कौर आदि महानुभावों/गणमान्यों द्वारा वक्ता के रूप में प्रतिभाग कर उपरोक्त विषय पर अपने-अपने वक्तव्य प्रस्तुत किये गये।
डाॅ० सत्येन्द्र पाल सिंह- पंजाबी भाषा के विकास के साथ-साथ उसकी लिपि का भी क्रमिक विकास हुआ है।

प्राचीन भारत की ब्राह्मी लिपि से विकसित होकर विभिन्न क्षेत्रीय लिपियों का निर्माण हुआ, जिनमें से एक धारा से गुरुमुखी लिपि का विकास माना जाता है। पंजाब क्षेत्र में समय-समय पर शारदा, टाकरी और लांडा जैसी लिपियों का भी प्रचलन रहा। इन लिपियों ने पंजाबी लेखन परंपरा को समृद्ध किया और आगे चलकर गुरुमुखी लिपि के स्वरूप निर्माण में योगदान दिया। स० नरेन्द्र सिंह मोंगा- जब गुरु साहिब ने ब्राह्मी लिपि से उत्पन्न पूर्व प्रचलित पंजाबी लिपियों लंडा, टाकरी, महाजनी, शारदा, सिद्ध मात्रिका के स्थान पर एक व्यवस्थित व्याकरण युक्त गुरुमुखी लिपि की रचना की उस समय धार्मिक रचनाओं के लेखन में सिद्धमात्रिका या सिद्धं लिपि का अधिक प्रयोग होता था और पाठशालाओं में लिपि शिक्षा आरंभ करने से पहले मंगलाचरण के रूप में “ॐ नमो सिद्धं” मंत्र का उच्चारण कराया जाता था और लिखते समय तख्ती पर सर्व प्रथम ॐ लिखा जाता था।

उस समय तक प्रचलित लिपियों का वर्णानुक्रम सस्सा (स) से या ऐड़ा (अ) से प्रारंभ होता था। गुरु अंगद देव जी ने वर्णमाला को व्यवस्थित करते हुए गुरुमुखी लिपि के वर्णानुक्रम को स (सस्सा) या अ (ऐड़ा) के स्थान पर ॐ के उ (ऊड़ा) अक्षर से प्रारंभ किया। मेजर (डाॅ०) मनमीत कौर सोढी-किसी भी भाषा की लिपि केवल लेखन का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह उस समाज की संस्कृति, इतिहास और परंपराओं की संरक्षिका भी होती है। गुरुमुखी लिपि के माध्यम से गुरु ग्रंथ साहिब सहित अनेक धार्मिक और साहित्यिक कृतियों का संरक्षण हुआ। पंजाबी लोक-साहित्य, वीरगाथाओं, सूफी काव्य और सामाजिक चेतना से जुड़े अनेक ग्रंथ इसी लिपि में सुरक्षित हैं।

अतः पंजाबी लिपि पंजाब की सांस्कृतिक धरोहर का अभिन्न अंग है।

सुश्री गुरमीत कौर- डिजिटल युग में पंजाबी लिपि का महत्व और भी बढ़ गया है। आज गुरुमुखी लिपि यूनिकोड के माध्यम से विश्वभर में प्रयोग की जा रही है। शिक्षा, साहित्य, पत्रकारिता, सोशल मीडिया और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में इसका व्यापक उपयोग हो रहा है। नई पीढ़ी को अपनी भाषा और लिपि से जोड़ने के लिए आवश्यक है कि गुरुमुखी लिपि के अध्ययन और प्रचार-प्रसार को प्रोत्साहित किया जाए। यह केवल भाषा का प्रश्न नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के संरक्षण का भी विषय है। पंजाबी लिपि का विकास एक दीर्घ ऐतिहासिक प्रक्रिया का परिणाम है।

गुरुमुखी लिपि ने पंजाबी भाषा को स्थायित्व, पहचान और साहित्यिक समृद्धि प्रदान की है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस अमूल्य विरासत के संरक्षण और संवर्धन के लिए सामूहिक प्रयास करें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी अपनी भाषा और लिपि के गौरव से परिचित हो सकें। पंजाबी भाषा की सर्वाधिक प्रचलित लिपि गुरुमुखी है। इसे व्यवस्थित और मानकीकृत स्वरूप प्रदान करने का श्रेय सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी को दिया जाता है। गुरुमुखी लिपि सरल, वैज्ञानिक और ध्वन्यात्मक दृष्टि से अत्यंत सशक्त मानी जाती है।

इस लिपि ने पंजाबी भाषा को एक सुदृढ़ पहचान प्रदान की तथा धार्मिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक ग्रंथों के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। कार्यक्रम में अकादमी प्रतिनिधि अरविन्द नारायण मिश्र, श्रीमती मीना सिंह, महेन्द्र प्रताप वर्मा, रवि यादव, श्रीमती अंजू सिंह, पंजाबी समाज के गणमान्य जन एवं श्रोतागण उपस्थित थे। श्रोतागणों द्वारा कार्यक्रम की सराहना करते हुये ऐसे ही भाषावैज्ञानिक विकास, साहित्यिक परंपरा तथा समकालीन महत्व को प्रकाशित करने वाले कार्यक्रम की पुनरावृत्ति किये जाने का अनुरोध किया गया। अन्त मंे कार्यक्रम समन्वयक श्री अरविन्द नारायण मिश्र ने संगोष्ठी में उपस्थित सम्माननीय वक्ताओं/विद्वानों को अंगवस्त्र एवं स्मृतिचिन्ह भेंट कर सम्मानित करते हुये सभी का साधुवाद आभार व्यक्त किया गया।

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