लखनऊ

“वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर व्याख्यान आयोजित, भारतीय मंदिर स्थापत्य की विशिष्ट परंपरा पर हुआ विस्तृत विमर्श !

लखनऊ:- ( 07 अगस्त, 2026 ) – : संस्कृति विभाग, उत्तर प्रदेश के अंतर्गत राज्य संग्रहालय, लखनऊ द्वारा आयोजित “डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल स्मृति व्याख्यानमाला” (26 जुलाई से 07 अगस्त, 2026) के अंतर्गत 06 अगस्त, 2026 को “वल्लभी की मंदिर वास्तुकला” विषय पर एक महत्वपूर्ण व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय कला, स्थापत्य, पुरातत्व, इतिहास एवं संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों तथा संस्कृति प्रेमियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डॉ. राकेश तिवारी, सेवानिवृत्त महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, नई दिल्ली रहे। उन्होंने पावरप्वाइंट प्रस्तुति के माध्यम से भारतीय मंदिर स्थापत्य की वल्लभी शैली तथा उसके ऐतिहासिक विकास, स्थापत्य विशेषताओं और सांस्कृतिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

डॉ. तिवारी ने बताया कि भारतीय मंदिर वास्तुकला का विकास एक दीर्घ एवं सतत प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें विभिन्न क्षेत्रीय शैलियों और स्थापत्य परंपराओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। वल्लभी शैली भारतीय मंदिर वास्तुकला की ऐसी विशिष्ट परंपरा है, जिसने उत्तर भारत के मंदिर निर्माण पर गहरा प्रभाव डाला। उन्होंने बताया कि इस शैली का मूल स्वरूप आयताकार अथवा लंबवत योजना पर आधारित होता था, जिसके ऊपर बैरल-वॉल्ट (गजपृष्ठाकार अथवा ढोलाकार) छत का निर्माण किया जाता था।

उन्होंने कहा कि गुप्त काल के बाद वल्लभी शैली का विकास विशेष रूप से देखा जाता है और इसके अनेक उदाहरण मध्य भारत, राजस्थान तथा उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में प्राप्त होते हैं। इस शैली में निर्मित मंदिरों की संरचना सरल होने के बावजूद अत्यंत प्रभावशाली होती थी। उन्होंने विभिन्न पुरातात्त्विक स्थलों एवं मंदिरों के चित्रों के माध्यम से वल्लभी शैली की विशेषताओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया तथा बताया कि किस प्रकार यह शैली बाद की विकसित नागर परंपरा के लिए आधार सिद्ध हुई। डॉ. तिवारी ने यह भी कहा कि भारतीय मंदिर केवल धार्मिक अनुष्ठानों के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सामाजिक, सांस्कृतिक और कलात्मक गतिविधियों के भी महत्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। मंदिर स्थापत्य के अध्ययन से तत्कालीन समाज की तकनीकी दक्षता, धार्मिक मान्यताओं, कलात्मक अभिरुचियों और सांस्कृतिक चेतना का ज्ञान प्राप्त होता है। उन्होंने वासुदेव शरण अग्रवाल के कला एवं संस्कृति संबंधी अध्ययनों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय कला और स्थापत्य की व्याख्या में उनकी दृष्टि अत्यंत व्यापक और सांस्कृतिक संदर्भों से परिपूर्ण थी।

इस अवसर पर डॉ. विनय कुमार सिंह, निदेशक, राज्य संग्रहालय, लखनऊ ने मुख्य वक्ता एवं उपस्थित प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए कहा कि डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति, कला एवं इतिहास के ऐसे युगद्रष्टा विद्वान थे, जिन्होंने भारतीय विरासत को समझने और व्याख्यायित करने की नई दिशा प्रदान की।

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