चंडीगढ़ PG Fire Case: हाईकोर्ट ने गैर इरादतन हत्या की धारा हटाई, अब लापरवाही से मौत का चलेगा मुकदमा
2020 के सेक्टर-32 पीजी अग्निकांड में तीन युवतियों की मौत के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, धारा 304 पार्ट-II रद्द कर केस सीजेएम कोर्ट भेजा गया।
चंडीगढ़:पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने चंडीगढ़ के सेक्टर-32 स्थित पीजी अग्निकांड( Chandigarh PG Fire Case)मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए पीजी संचालक और मकान मालिक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304 पार्ट-II (गैर इरादतन हत्या) के तहत चल रहे मुकदमे को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि जांच में ऐसा कोई प्रथमदृष्टया साक्ष्य सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपितों को अपने कृत्यों के कारण मौत होने की संभावना का पूर्व ज्ञान था। हालांकि, सुरक्षा मानकों में गंभीर लापरवाही के आरोप बरकरार रखते हुए मामले में धारा 304-ए सहित अन्य धाराओं के तहत सुनवाई जारी रहेगी।
यह मामला 22 फरवरी 2020 को सेक्टर-32 स्थित एक पेइंग गेस्ट (पीजी) आवास में लगी भीषण आग से जुड़ा है। हादसे में रिया, पाक्षी और मुस्कान की दम घुटने से मौत हो गई थी, जबकि फेमिना सरदाना और जैस्मिन कौर गंभीर रूप से झुलस गई थीं। घटना के बाद पुलिस और दमकल विभाग ने राहत एवं बचाव अभियान चलाया था तथा उसी दिन पीजी संचालक नितेश बंसल को गिरफ्तार कर लिया गया था।
जस्टिस वीरेंद्र अग्रवाल की एकल पीठ ने अपने फैसले में कहा कि उपलब्ध जांच सामग्री अधिकतम लापरवाही को दर्शाती है, लेकिन यह साबित नहीं करती कि आरोपितों को अपने कार्यों के संभावित घातक परिणाम का ज्ञान था। अदालत के अनुसार, आईपीसी की धारा 304 पार्ट-II लागू करने के लिए इस प्रकार का ज्ञान होना आवश्यक है, जो इस मामले में प्रथमदृष्टया स्थापित नहीं होता।
हाईकोर्ट ने यूटी के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 2 अगस्त 2021 को तय किए गए आरोपों को निरस्त करते हुए निर्देश दिया कि आरोपितों पर अब आईपीसी की धारा 304-ए (लापरवाही से मृत्यु कारित करना), धारा 336, धारा 338 और धारा 34 के तहत मुकदमा चलाया जाए। चूंकि धारा 304-ए के मामलों का विचारण मजिस्ट्रेट स्तर पर होता है, इसलिए अदालत ने पूरा मामला मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी (सीजेएम) की अदालत को भेजने का आदेश दिया।
अभियोजन के अनुसार, आरोपित बिना आवश्यक अनुमति के किराये के मकान में पीजी संचालित कर रहे थे। अधिक लोगों को ठहराने के लिए कमरों में फाइबर और लकड़ी जैसे अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थों से अवैध पार्टिशन बनाए गए थे। इसके अलावा गलियारे और सीढ़ियां संकरी थीं तथा भवन में आपातकालीन निकास और पर्याप्त अग्निशमन व्यवस्था का अभाव था, जिसके कारण आग लगने के बाद सुरक्षित निकासी संभव नहीं हो सकी।
अपने आदेश में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अभियोजन के सभी आरोपों को उनके सर्वोच्च स्तर पर भी स्वीकार कर लिया जाए, तब भी वे सुरक्षा मानकों के पालन में लापरवाही का मामला बनाते हैं, न कि गैर इरादतन हत्या का। इसी आधार पर अदालत ने धारा 304 पार्ट-II के आरोप हटाते हुए मामले को कानून के अनुसार आगे की सुनवाई के लिए सीजेएम अदालत को स्थानांतरित कर दिया।





