चीन-अमेरिकी साम्राज्यवादी मिलीभगत को जायज ठहराने का प्रयास :पी. जे. जेम्स

लखनऊ-: वैश्विक प्रभुत्व के लिए प्रतिस्पर्धा और दुनिया के मेहनतकशों तथा प्राकृतिक संसाधनों की लूट के लिए मिलीभगत—अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोधों की यही अंतर्निहित गतिशीलता है। मिलीभगत और प्रतिस्पर्धा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और साम्राज्यवादी शक्तियों के बदलते शक्ति-संतुलन के दौर में इनके बीच का यह द्वंद्व और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। आज जब अत्यधिक विस्तार और बढ़ते दबाव से जूझ रहा अमेरिकी साम्राज्यवाद सापेक्ष पतन की स्थिति में है,
वहीं उभरता हुआ चीनी साम्राज्यवाद बाजारों तथा ‘नव-औपनिवेशिक प्रभाव क्षेत्रों’ में अपने लिए अधिक हिस्सेदारी की मांग कर रहा है। इसी संदर्भ में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने “थ्यूसीडाइड्स ट्रैप” की अवधारणा का उल्लेख किया है। यह शब्द उस खतरनाक तनाव को अभिव्यक्त करता है जो तब उत्पन्न होता है, जब कोई उभरती हुई शक्ति किसी स्थापित महाशक्ति को विस्थापित करने की स्थिति में पहुंचती है। शी ने ट्रंप से युद्ध के जोखिम को टालने और सह-अस्तित्व का रास्ता अपनाने का आह्वान किया—ऐसा सह-अस्तित्व, जो दोनों शक्तियों को विश्व की लूट में अपने-अपने हिस्से को सुरक्षित करने में मदद कर सके।
इसी संदर्भ में 24-26 सितंबर 2026 को व्हाइट हाउस में हुआ हाई-प्रोफाइल ट्रंप-शी शिखर सम्मेलन महज एक राजनयिक मुलाकात नहीं था। यह क्रमशः पतनशील और उभरती हुई दो महाशक्तियों—अमेरिका और चीन—के बीच ‘खेल के नियमों’ को पारस्परिक रूप से निर्धारित करने और अपने-अपने हितों के लिए एक अस्थायी समझ कायम करने की कोशिश थी। इसके पीछे मूल उद्देश्य दुनिया के मेहनतकशों के शोषण, दुनिया की जनता के दमन तथा प्रकृति की अभूतपूर्व कॉरपोरेट लूट को जारी रखना है। शी का यह बयान कि चीन का “राष्ट्रीय पुनरुत्थान” और ट्रंप का “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” (MAGA) एजेंडा साथ-साथ अस्तित्व में रह सकते हैं और एक-दूसरे को मजबूत कर सकते हैं, दोनों महाशक्तियों के बीच उच्च-स्तरीय सौदेबाजी और मिलीभगत की वास्तविकता को स्पष्ट करता है। इसी प्रकार, ट्रंप द्वारा शी के साथ अपनी “महान मित्रता” की प्रशंसा भी इस तथ्य को रेखांकित करती है कि दोनों शक्तियां, अपने अंतर्विरोधों के बावजूद, दुनिया की जनता के हितों की कीमत पर अपने-अपने साम्राज्यवादी हितों को प्राथमिकता देने के लिए सहयोग कर सकती हैं।
अंतर्विरोध भी, मिलीभगत भी बेशक, ताइवान का प्रश्न—ट्रंप द्वारा ताइवान के लिए 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को अस्थायी रूप से रोके जाने के बावजूद चीन-अमेरिका संबंधों में एक महत्वपूर्ण अंतर्विरोध बना हुआ है। इसी प्रकार ईरान से चीन द्वारा तेल आयात, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, महत्वपूर्ण दुर्लभ-पृथ्वी खनिजों, सेमीकंडक्टर उपकरणों और माइक्रोचिप्स के व्यापार सहित अनेक मुद्दों पर दोनों देशों के अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध अभी भी अनसुलझे हैं। लेकिन इन अंतर्विरोधों के साथ-साथ सहयोग और मिलीभगत की भावना भी उतनी ही स्पष्ट है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण 24 सितंबर को ट्रंप द्वारा आयोजित राजकीय रात्रिभोज था। इस भोज में शी के साथ चीनी ‘राज्य एकाधिकार पूंजीवाद’—अर्थात चीनी साम्राज्यवाद—का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग दो दर्जन वरिष्ठ पार्टी नौकरशाह और अरबपति मौजूद थे। दूसरी ओर, ट्रंप और व्हाइट हाउस के अधिकारियों के साथ अमेरिका की प्रमुख वित्तीय और तकनीकी कॉरपोरेट शक्तियों के सीईओ तथा शीर्ष प्रतिनिधि शामिल थे। इनमें SpaceX, Nvidia, Meta, Apple, Goldman Sachs, New York Stock Exchange, OpenAI, Google, Amazon, General Motors, ExxonMobil, FOX News, Visa, Mastercard, Citigroup, Qualcomm और Pfizer आदि शामिल थे।
इस अर्थ में यह राजकीय भोज नव-फासीवादी ट्रंप शासन और चीनी नौकरशाही राज्य-एकाधिकार पूंजीवाद के बीच उभरती हुई अपवित्र मिलीभगत की एक ठोस अभिव्यक्ति बन गया। दोनों का साझा भौतिक आधार 21वीं सदी में पूंजी के अंतर्राष्ट्रीयकरण के दौर की सबसे प्रतिक्रियावादी कॉरपोरेट-वित्तीय पूंजी है। निस्संदेह, पूंजी की गति के तर्क और उसके अंतर्निहित नियमों के अनुसार अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोधों का तीखा होना अपरिहार्य है। लेकिन शी-ट्रंप शिखर सम्मेलन से जो बात स्पष्ट हुई, वह यह है कि दोनों शक्तियां प्रत्यक्ष सैन्य टकराव से बचने के लिए एक समझ और अस्थायी युद्धविराम की तलाश में हैं—क्योंकि ऐसा टकराव दोनों के लिए विनाशकारी हो सकता है।
यह मिलीभगत कोई नई घटना नहीं वास्तव में, अमेरिका और चीन के बीच यह अपवित्र सौदा कोई नई घटना नहीं है। 1949 से 1972 तक चीन के दृढ़ साम्राज्यवाद-विरोधी रुख के कारण अमेरिकी साम्राज्यवाद ने चीन जनवादी गणराज्य (PRC), जिसका नेतृत्व चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) करती थी, को औपचारिक मान्यता तक नहीं दी थी। अमेरिका ताइवान के साथ पूर्ण राजनयिक संबंध बनाए हुए था और उसने संयुक्त राष्ट्र में चीन के प्रवेश को भी अवरुद्ध किया था। लेकिन 1970 के दशक की शुरुआत में चीन-सोवियत विभाजन का लाभ उठाते हुए चीन ने 1972 में अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन के बीजिंग दौरे के लिए लाल कालीन बिछाया। इसके परिणामस्वरूप PRC को चीन की वैध सरकार के रूप में मान्यता मिली और आगे चलकर उसे संयुक्त राष्ट्र तथा सुरक्षा परिषद में स्थान प्राप्त हुआ।
इसके बाद 1973-74 में CPC द्वारा कुख्यात “तीन दुनिया सिद्धांत” (Three World Theory) प्रतिपादित किया गया, जिसमें सोवियत संघ को दुनिया का “नंबर एक दुश्मन” बताया गया। इससे चीन-अमेरिका संबंधों में निर्णायक बदलाव आया। दोनों ने सोवियत संघ के खिलाफ सहयोग किया और अमेरिका को खुश करने के लिए चीन ने वियतनाम से अपने सैनिकों की वापसी तक की। 1980 के दशक से चीन में पूंजीवादी पुनर्स्थापना के तेज होने के साथ-साथ चीन और अमेरिका के आर्थिक संबंध लगातार गहरे होते गए। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन के विशाल और सस्ते श्रम-स्रोत का लाभ उठाने के लिए वहां पहुंचने लगीं। चीन के WTO में प्रवेश और वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में उसके बढ़ते एकीकरण के बाद अमेरिका ने 2001 में चीन को “मोस्ट फेवर्ड नेशन” (MFN) का दर्जा प्रदान किया।
चीन का उभार और अमेरिकी प्रभुत्व का संकट 21वीं सदी के आगमन के साथ, और विशेष रूप से 2007-08 के “वैश्विक आर्थिक संकट” के बाद, चीन एक शक्तिशाली साम्राज्यवादी ताकत के रूप में उभरा है। हालांकि उसकी संरचना, अवधारणाएं और कार्यप्रणाली पारंपरिक पश्चिमी साम्राज्यवाद से कुछ अलग हैं।
शीतयुद्ध के बाद के नवउदारवादी-नवफासीवादी दौर में अमेरिकी नेतृत्व वाली साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था गहरे संकट और पुनर्संरचना के दौर से गुजर रही है। पूंजी के अंतर्निहित तर्क ने अमेरिकी साम्राज्यवाद की वैश्विक स्थिति को बदल दिया है। दुनिया के सबसे बड़े विनिर्माता और सबसे बड़े व्यापारिक शक्ति के रूप में अमेरिका की पुरानी स्थिति को चीन ने काफी हद तक चुनौती दी है।
लगभग 80 देशों में 750-800 सैन्य अड्डों के बावजूद अमेरिकी साम्राज्यवाद के सामने इन्हें बनाए रखने का आर्थिक और भौतिक आधार लगातार कमजोर हो रहा है। वह अपनी अनेक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से पीछे हट रहा है, विशेषकर संयुक्त राष्ट्र से संबद्ध संस्थाओं के प्रति। एक हद तक ये संस्थाएं स्वयं अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा निर्मित राजनीतिक व्यवस्थाएं थीं, जिनके माध्यम से उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद नव-औपनिवेशिक प्रभुत्वशाली शक्ति के रूप में अपनी भूमिका को आगे बढ़ाया।
दूसरी ओर, तथाकथित “चौथी औद्योगिक क्रांति” से जुड़ी ‘फ्रंटियर टेक्नोलॉजीज’ में चीन ने महत्वपूर्ण बढ़त हासिल की है। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (WIPO) के शीर्ष 100 नवाचार केंद्रों में चीन के 24 “इनोवेशन हब” हैं, जबकि अमेरिका उससे काफी पीछे है। चीन आज दुनिया की प्रमुख विनिर्माण शक्ति है और विश्व के औद्योगिक उत्पादन में उसका हिस्सा लगभग 30 प्रतिशत है, जबकि अमेरिका का हिस्सा लगभग 15 प्रतिशत है। टकराव के साथ समझौते की तलाश अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व से हटने की बढ़ती प्रवृत्ति—अर्थात डी-डॉलरीकरण—के बीच वाशिंगटन द्वारा लगाए जा रहे दबावपूर्ण शुल्क( टैरिफ ) और वित्तीय नाकेबंदियां चीन के खिलाफ पहले की तुलना में कम प्रभावी होती जा रही हैं। इस परिस्थिति में चीन-अमेरिका के अंतर-साम्राज्यवादी अंतर्विरोध लगातार तीखे हो रहे हैं। फिर भी दोनों शक्तियां, अपने-अपने अलग दृष्टिकोण और हितों के बावजूद, खुले टकराव के बजाय एक अस्थायी समझ और युद्धविराम चाहती हैं। व्हाइट हाउस में हुआ शी-ट्रंप शिखर सम्मेलन इसी तत्काल परिस्थिति की अभिव्यक्ति है। इसलिए हमें अंतर-साम्राज्यवादी संबंधों को केवल प्रतिस्पर्धा या केवल सहयोग के किसी एक रूप में नहीं देखना चाहिए। पूंजीवाद के वर्तमान चरण में साम्राज्यवादी शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा और मिलीभगत साथ-साथ चलती हैं। परिस्थितियों के अनुसार इन दोनों में से किसी एक का रूप अधिक प्रमुख हो सकता है, लेकिन दोनों एक-दूसरे से अविभाज्य हैं।
मेहनतकश जनता के लिए स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प जरूरी फिर भी मूल प्रश्न यह है कि चाहे अमेरिकी प्रभुत्व की जगह चीन के नेतृत्व वाला कोई साम्राज्यवादी गुट स्थापित हो या एक बहुध्रुवीय वैश्विक व्यवस्था विकसित हो—यदि अंतरराष्ट्रीय वामपंथ मेहनतकशों और उत्पीड़ित जनता के दृष्टिकोण से एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प सामने नहीं रखता, तो मानवता के सामने खड़ा संकट समाप्त नहीं होगा।साम्राज्यवाद के एक गुट को दूसरे गुट से बदल देना मेहनतकश जनता की मुक्ति का विकल्प नहीं हो सकता। वास्तविक विकल्प तभी संभव है जब अंतरराष्ट्रीय वामपंथ 21वीं सदी के साम्राज्यवाद की प्रकृति, उसकी बदलती संरचना और उसके संचालन के तौर-तरीकों को सही ढंग से समझते हुए उसके विरुद्ध एक स्वतंत्र राजनीतिक दिशा विकसित करे। इस कार्य के लिए 21वीं सदी के साम्राज्यवाद पर वैचारिक-राजनीतिक स्पष्टता और उसके संचालन की ठोस समझ आज पहले से कहीं अधिक जरूरी है। यही वह आधार है जिस पर दुनिया के मेहनतकशों और उत्पीड़ित जनता की स्वतंत्र राजनीतिक ताकत को संगठित किया जा सकता है।
