चीन की बहुत बड़ी मजबूरी(great compulsion) है ताइवान को न छोड़ना
ताइवान: अमेरिकी स्पीकर नैंसी पेलोसी ने जब से ताइवान का दौरा किया है तब से पूर्वी एशिया में महौल गरमाया हुआ है. चीन और ताइवान के बीच लगातार तनाव बढ़ता जा रहा है. ताइवान हमेशा से ही चीन के लिए बड़ी समस्या रहा रहा है और वह इसके लिए काफी संवेदनात्मक भी है. ताइवान को लेकर चीन में पागलों की तरह खुमार है और इस पर कब्जा करने के लिए वह कई बार सेना की ताकत की भी धौंस दिखा चुका है. अब ताइवान चीन के लिए एक बहुत बड़ी मजबूरी(great compulsion) बन गया है.
ताइवान को लेकर बढ़ते विवाद के बीच कई बार ऐसे सवाल उठते हैं कि आखिर ताइवान पर चीन का ऐसा रुख क्यों है और वह क्यों नहीं ताइवान को जाने दे सकता. इसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर चीन ताइवान को आजाद देश घोषित कर देता है तो फिर उसके सामने ताइवान के बाद मंगोलिया, तिब्बत और शिनजियांग की भी समस्या उत्पन्न हो सकती है.
इसके साथ ही ताइवान को आजाद देश घोषित करने के साथ ही चीन के सामने अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर भी काफी दबाव पड़ने लगेगा. ताइवान को लेकर अभी सिर्फ मांगे बाहर से ही उठती हैं लेकिन अगर ऐसी समस्या देश के अंदर उत्पन्न होती हैं तो उसके लिए उस स्थिति को संभालना काफी मुश्किल हो जाएगा. इसके साथ वे दूसरे देश भी सवाल उठाने लगेंगे जिनकी सीमाओं पर चीन ने कब्जा कर रखा है.
बता दें कि चीन के मौजूदा नक्शे में शिनजियांग, तिब्बत और इनर मंगोलिया उसकी सीमा पर हैं. ये सभी किंग राजशाही के अंतर्गत आते हैं. 1911 में चीन ने इस सभी पर कब्जा कर लिया था. अगर चीन सभी सीमाओं पर अपना दावा छोड़ देता है तो फिर शिनजियांग , तिब्बत और इनर मंगोलिया में रह रही आबादी का क्या होगा.
ताइवान को छोड़ते ही चीन के सामने कई मुसीबतें आ जाएंगी. विदेश नीति के लोगों का कहना है कि चीन को ताइवान के मुद्दे पर समझदारी से काम लेना होगा और उसके साथ अपने मतभेदों को भी कम करने की जरूरत है.
पिछले कई सालों में दुनिया भर के कई देश चीन के रवैये से परेशान हो चुके हैं. लोग उसकी दबंग नीति के खिलाफ होते जा रहे हैं. हो सकता है कि चीन इस मुद्दे पर भी कुछ ऐसा ही रुख अपनाए. हो सकता है कि वह दुनिया भर के देशों से कह सकता है कि या तो वह चीन की वर्तमान स्थिति को स्विकार करें या फिर चुप रहें.
चीन की विस्तारवादी नीति से भी दुनिया में कई तरह की चिंताएं हैं. चाहे हांगकांग हो या फिर साउथ चाइना सी, चीन हमेशा ही अपनी विस्तारवादी नीति को प्रदर्शित करता रहता है. हांगकांग को वापस लेकर चीन ने खुले तौर पर अपनी नीति का प्रदर्शन किया. साउथ चाइना सी के जरिए वह मलेशिया और वियतनाम में अपने कदम बढ़ाने की कोशिश कर रहा है.





