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राष्ट्रीय विद्युत नीति में साझा वितरण नेटवर्क का इंजीनियर्स फेडरेशन करेगा विरोध

लखनऊ-: विद्युत मंत्रालय द्वारा प्रस्तावित नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (National Electricity Policy) के मसौदे को अगले माह केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष प्रस्तुत किए जाने संबंधी मीडिया रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने प्रस्तावित प्रावधानों का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि यदि इन जनविरोधी एवं उपभोक्ता-विरोधी प्रावधानों को लागू करने का प्रयास किया गया तो AIPEF देशभर के बिजली कर्मचारियों, अभियंताओं एवं श्रमिकों के साथ मिलकर इसका पुरजोर विरोध करेगा।

शैलेन्द्र दुबे ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों में वर्णित साझा वितरण नेटवर्क (Shared Distribution Network), एकाधिक वितरण लाइसेंसधारी (Multiple Distribution Licensees), डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम ऑपरेटर (DSO) की स्थापना, बड़े उपभोक्ताओं को यूनिवर्सल सर्विस ऑब्लिगेशन से छूट, क्रॉस-सब्सिडी में कमी तथा महंगाई सूचकांक से जुड़ा स्वचालित वार्षिक टैरिफ संशोधन जैसे प्रस्ताव वस्तुतः बिजली वितरण क्षेत्र के निजीकरण तथा राज्य के स्वामित्व वाली वितरण कंपनियों को कमजोर करने की दिशा में उठाए जा रहे कदम हैं।

उन्होंने कहा कि एक ही वितरण नेटवर्क पर अनेक वितरण लाइसेंसधारियों को कार्य करने की अनुमति देने से निजी कंपनियां केवल लाभकारी उपभोक्ताओं को चुनेंगी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों, किसानों तथा आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को विद्युत आपूर्ति का दायित्व सरकारी वितरण कंपनियों पर ही रहेगा। इससे सरकारी डिस्कॉम की वित्तीय स्थिति गंभीर रूप से प्रभावित होगी और अंततः इसका बोझ आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। दुबे ने कहा कि बिजली दरों को महंगाई सूचकांक से जोड़कर स्वचालित वार्षिक टैरिफ संशोधन की व्यवस्था लागू करने से बिना समुचित नियामकीय परीक्षण के प्रत्येक वर्ष बिजली दरों में वृद्धि का रास्ता खुल जाएगा, जिससे घरेलू एवं छोटे व्यावसायिक उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।

उन्होंने क्रॉस-सब्सिडी को क्रमशः समाप्त करने तथा बड़े उद्योगों, रेलवे एवं मेट्रो रेल जैसी संस्थाओं को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज से छूट देने के प्रस्ताव पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। उनका कहना था कि इससे घरेलू उपभोक्ताओं, किसानों तथा छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ेगा और सभी वर्गों को सस्ती एवं समान बिजली उपलब्ध कराने की अवधारणा कमजोर होगी। फेडरेशन के चेयरमैन ने कहा कि डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम ऑपरेटर (DSO) की अवधारणा भी एकाधिक वितरण लाइसेंसधारियों को बढ़ावा देने तथा वितरण क्षेत्र के निजीकरण का मार्ग प्रशस्त करने के उद्देश्य से लाई जा रही है। उन्होंने कहा कि ये सभी प्रस्ताव विद्युत (संशोधन) विधेयक के विवादास्पद प्रावधानों से मेल खाते हैं, जिनका बिजली कर्मचारी, अभियंता, श्रमिक संगठन तथा अनेक राज्य सरकारें लगातार विरोध करती रही हैं। शैलेन्द्र दुबे ने केंद्र सरकार से मांग की कि राष्ट्रीय विद्युत नीति के मसौदे से ऐसे सभी जनविरोधी प्रावधान तत्काल वापस लिए जाएं। इसके स्थान पर सार्वजनिक क्षेत्र की विद्युत वितरण कंपनियों को सुदृढ़ बनाने, तकनीकी एवं वाणिज्यिक हानियों को निवेश के माध्यम से कम करने, परिचालन दक्षता बढ़ाने तथा सभी उपभोक्ताओं को सस्ती, विश्वसनीय एवं गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध कराने पर ध्यान दिया जाए।

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार इन प्रस्तावों को आगे बढ़ाती है तो AIPEF बिजली कर्मचारियों, अभियंताओं, श्रमिक संगठनों, ट्रेड यूनियनों तथा उपभोक्ता संगठनों के साथ मिलकर देशव्यापी आंदोलन चलाएगा और इन जनविरोधी तथा उपभोक्ता-विरोधी प्रावधानों को लागू नहीं होने देगा। दुबे ने कहा, “बिजली क्षेत्र कोई व्यापारिक अवसर नहीं, बल्कि जनसेवा का माध्यम है। ऑल इंडिया पॉवर इंजीनियर्स फेडरेशन सार्वजनिक विद्युत वितरण व्यवस्था को कमजोर करने या निजीकरण के किसी भी प्रयास का हर स्तर पर विरोध करेगा तथा उपभोक्ताओं, कर्मचारियों और राष्ट्रहित की रक्षा के लिए अपना संघर्ष निरंतर जारी रखेगा।”

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