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नेपाल का ‘सिस्टम’ बदलने जा रहे 35 साल के पीएम बालेंद्र शाह, सदियों पुराने ‘कलंक’ के लिए मांगेंगे माफी !

नेपाल की राजनीति में इन दिनों एक नई क्रांति की सुगबुगाहट है. वहां के युवा प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार ने ऐलान किया है कि वह नेपाल के दलित समुदाय से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेगी. यह माफी उस ऐतिहासिक अन्याय और भेदभाव के लिए होगी, जो सदियों से इस समुदाय ने झेला है. प्रधानमंत्री के 100 पॉइंट रिफॉर्म एजेंडा के तहत अगले 15 दिनों के भीतर यह माफीनामा जारी किया जाएगा. यह दक्षिण एशिया के इतिहास में अपनी तरह की पहली घटना होगी, जब कोई सरकार आधिकारिक तौर पर स्वीकार करेगी कि राज्य और समाज ने एक खास समुदाय के साथ गलत किया है.  नेपाल में बालेंद्र शाह को बदलाव का प्रतीक माना जा रहा है. 35 साल के शाह एक पूर्व रैपर और काठमांडू के मेयर रह चुके हैं. पिछले महीने हुए चुनाव में उन्होंने जीत हासिल की थी. उनकी सरकार ऐसे समय में बनी है, जब नेपाल की नई पीढ़ी पुराने ढर्रों को तोड़ने के लिए सड़कों पर उतरी थी. नेपाल की 3 करोड़ की आबादी में दलितों की हिस्सेदारी 13 परसेंट से ज्यादा है. इसके बावजूद वे समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं. बालेंद्र शाह के एजेंडे में साफ कहा गया है कि सरकार औपचारिक रूप से उन अन्यायों को स्वीकार करेगी, जो दलितों और हाशिए पर रहने वाले समुदायों पर थोपे गए थे.

बालेंद्र शाह की सरकार का मानना है कि सिर्फ कानून बना देने से समाज नहीं बदलता है. नेपाल ने साल 2006 में खुद को ‘छुआछूत मुक्त राष्ट्र’ घोषित किया था. इसके बाद 2011 में भेदभाव को अपराध भी बनाया गया. लेकिन हकीकत में जमीन पर स्थितियां बहुत ज्यादा नहीं बदलीं. शाह का मानना है कि जब तक राज्य अपनी पुरानी गलतियों को स्वीकार नहीं करता, तब तक सुधार की कोशिशें ईमानदार नहीं हो सकतीं. सरकार की योजना है कि माफी के बाद सामाजिक न्याय और समावेशी बहाली के ठोस कदम उठाए जाएंगे.

दलित अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने इस कदम का जोरदार स्वागत किया है. हीरा लाल विश्वकर्मा जैसे एक्टिविस्ट कहते हैं कि किसी भी दुखद घटना से आगे बढ़ने के लिए जरूरी है कि पहले उसे स्वीकार किया जाए. उन्होंने नेपाल के अखबार ‘सेतोपाटी’ से कहा कि राज्य ने पहले कभी यह नहीं माना था कि भेदभाव अब भी मौजूद है. सरकारी माफी एक तरह की ऐतिहासिक सुलह की शुरुआत होगी. इससे उन करोड़ों लोगों को सम्मान मिलेगा, जिन्हें समाज ने हमेशा दूर रखा.

इस माफी को लेकर उत्साह तो है, लेकिन सवाल भी कम नहीं हैं. दलित समाज विकास मंच की अध्यक्ष सरस्वती नेपाली का कहना है कि यह माफी हमारे जख्मों पर मरहम की तरह होगी. लेकिन इसे पूरी तरह ठीक करने के लिए सरकार को हमारे अधिकारों की गारंटी देनी होगी. उन्होंने बचपन की एक दर्दनाक घटना याद करते हुए बताया कि स्कूल में उन्हें मटके से पानी नहीं पीने दिया जाता था. उन्हें प्यास बुझाने के लिए घर तक पैदल जाना पड़ता था. ऐसे अनुभव नेपाल के लाखों दलितों के हैं. काठमांडू पोस्ट ने भी अपने संपादकीय में इस कदम की तारीफ की है. हालांकि, उसने सरकार को चेतावनी भी दी है कि बदलाव लाना कहना जितना आसान नहीं है. अखबार का कहना है कि भेदभाव विरोधी कानूनों को सख्ती से लागू करना होगा. दलितों को शिक्षा और नौकरी के बाजार में बराबरी का हक दिलाना होगा. जब तक हिंसा करने वालों को सजा नहीं मिलेगी, तब तक माफी सिर्फ एक कागजी घोषणा बनकर रह जाएगी.

नेपाल के इस फैसले की गूंज भारत में भी सुनाई दे रही है. भारत में दलितों की स्थिति नेपाल से बहुत अलग नहीं है. यहां भी सदियों पुरानी जाति व्यवस्था की जड़ें बहुत गहरी हैं. नेपाल के फैसले के बाद भारतीय सांसद चंद्रशेखर आजाद ने लोकसभा में यह मुद्दा उठाया. उन्होंने मांग की कि भारतीय संसद को भी हजारों सालों से हो रहे अन्याय की नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए. उन्होंने सवाल किया कि भारत सरकार उन लोगों से माफी कब मांगेगी, जिन्हें आज भी रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी चीजों के लिए लड़ना पड़ता है.

भारत में जाति व्यवस्था आज भी राजनीति और समाज का एक अहम हिस्सा है. हालांकि 1950 में संविधान ने छुआछूत को खत्म कर दिया था, लेकिन ग्रामीण इलाकों में आज भी भेदभाव की खबरें आती रहती हैं. भारत सरकार अगले सेंसस में जातिगत आंकड़े जुटाने की तैयारी कर रही है. समर्थकों का मानना है कि इससे आरक्षण और कल्याणकारी योजनाओं को बेहतर तरीके से लागू करने में मदद मिलेगी. नेपाल की पहल ने भारतीय नीति निर्माताओं पर भी एक नैतिक दबाव बना दिया है.

नेपाल और भारत के अलावा बांग्लादेश और पाकिस्तान में भी दलित समुदाय बेहद मुश्किल दौर से गुजर रहा है. बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने हाल ही में कहा था कि वह देश को हर नागरिक के लिए स्वतंत्र बनाना चाहते हैं. उन्होंने हिंदू, बौद्ध, ईसाई और दलितों के अधिकारों की बात की. बांग्लादेश में लगभग 60 लाख दलित रहते हैं, जिनमें से ज्यादातर हिंदू धर्म से जुड़े हैं. वहां अब तक सरकार ने कभी औपचारिक माफी नहीं मांगी है. वे आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे पिछड़े पायदान पर हैं.

पाकिस्तान की स्थिति और भी खराब है. वहां 2017 की जनगणना के अनुसार दलितों (शेड्यूल्ड कास्ट) की संख्या 8 लाख से ज्यादा बताई गई थी. लेकिन जानकारों का कहना है कि उनकी असल संख्या करोड़ों में हो सकती है. पाकिस्तान के दलित ज्यादातर सिंध प्रांत में रहते हैं. वे आज भी हाथ से मैला ढोने, सीवर की सफाई और चमड़े के काम जैसे पेशों में फंसे हुए हैं. वहां जाति व्यवस्था के साथ-साथ धार्मिक भेदभाव का दोहरा बोझ भी उन पर है.

नेपाल की पहल एक नई शुरुआत हो सकती है, लेकिन पूरे दक्षिण एशिया की तस्वीर मिली-जुली है. श्रीलंका में जाति व्यवस्था उतनी गंभीर नहीं दिखती, लेकिन वहां भी कुछ समुदायों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता. वहीं अफगानिस्तान में हालात बिल्कुल उलट हैं. तालिबान ने वहां एक नया पीनल कोड लागू किया है, जो समाज को ऊंच-नीच के खांचों में बांटता है. वहां मुल्लाओं को कानून से ऊपर रखा गया है, जबकि गरीब तबके के लिए सख्त सजाएं हैं.

 

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