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रूस ने वीटो क्यों किया?(रूस)

सियोल: उत्तर कोरिया कई साल से अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल हथियार कार्यक्रम को लेकर संयुक्त राष्ट्र के प्रतिबंधों के एक जटिल नेटवर्क के अधीन रहा है. इन पाबंदियों का उल्लंघन न हो सके, इसपर संयुक्त राष्ट्र की एक्सपर्ट टीम पूरी निगरानी रखती है. हालांकि, उत्तर कोरिया के दोस्त रूस ने एक वीटो से इन पाबंदियों के ज्यादातर हिस्से को रोक दिया है. रूस  (रूस) ने उत्तर कोरिया पर प्रतिबंधों को तो नहीं हटाया, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की निगरानी को जरूर खत्म कर दिया है. ये संयुक्त राष्ट्र पर उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन की एक बड़ी जीत कही जा सकती है.
रूस को अमेरिका द्वारा प्रायोजित सुरक्षा परिषद के इस प्रस्ताव के जरिए संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों की एक कमिटी के कार्यकाल को एक साल के लिए बढ़ाया जाना था, लेकिन रूस के वीटो से अब इसका संचालन रुक जाएगा. रूस ने गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र के एक प्रस्ताव पर वीटो कर दिया, जिससे संयुक्त राष्ट्र विशेषज्ञों द्वारा उत्तर कोरिया के खिलाफ प्रतिबंधों की निगरानी अप्रभावी हो गई. 15 सदस्यीय परिषद में प्रस्ताव के पक्ष में 13 मत पड़े, जबकि रूस ने विरोध में वोट किया. जबकि चीन वोटिंग में अनुपस्थित रहा. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं. इन्हें वीटो (निषेधाज्ञ्या) पावर मिला हुआ है.

आइए जानते हैं कि उत्तर कोरिया के प्रतिबंधों की निगरानी पर रूस के वीटो का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा:-

क्या है मामला?
2009 में उत्तर कोरिया ने अपने दूसरे परमाणु हथियार का परीक्षण किया था. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र ने उसपर कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे. किसी भी प्रतिबंध-उल्लंघन गतिविधियों की निगरानी और इसकी रिपोर्टिंग के लिए रूस और चीन के समर्थन से एक्सपर्ट का एक पैनल भी बनाया गया था.

ये एक्सपर्ट पैनल हर साल अप्रैल के आखिर में खत्म हो जाती है. इस साल रूस ने इसके रिन्यूबल प्रोसेस को अपने एक वोट से रोक दिया है. कुछ हफ्ते पहले इस मामले में एक्सपर्ट पैनल ने कहा था कि वह रूस और उत्तर कोरिया के बीच हथियारों के ट्रांजेक्शन की रिपोर्ट की जांच कर रहा है. कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों में दावा किया गया है कि उत्तर कोरिया ने यूक्रेन, दक्षिण कोरिया और अमेरिका में इस्तेमाल के लिए बड़ी मात्रा में हथियार रूस को भेजे हैं.
दक्षिण कोरिया के संयुक्त राष्ट्र राजदूत ह्वांग जून-कूक ने कहा, “रूस का वीटो एक तरह से क्राइम करते रंगे हाथों पकड़े जाने से बचने के लिए CCTV कैमरे को डैमेज करने जैसा है.”

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रूस ने वीटो क्यों किया?
रूस का दावा है कि संयुक्त राष्ट्र का एक्सपर्ट पैनल सही तरीके से अपना काम नहीं कर रहा था. रूस के संयुक्त राष्ट्र राजदूत वासिली नेबेंज़िया ने एक्सपर्ट पैनल पर पक्षपातपूर्ण जानकारी को दोबारा छापने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा, “पैनल पश्चिमी देशों के इशारे पर काम कर रहे थे.”

हाल के वर्षों में रूस और उत्तर कोरिया काफी करीब आ गए हैं. यूक्रेन के साथ चल रही जंग के बीच रूस के रिश्ते उत्तर कोरिया के साथ और गहरे हुए हैं. कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल यूनिफिकेशन के एक सीनियर एनालिस्ट होंग मिन ने न्यूज एजेंसी ‘AFP’ को बताया, “रूस ने उत्तर कोरिया के जरिए अपने ही देश के खिलाफ प्रतिबंधों का विरोध किया है.”

वोटिंग के समय चीन क्यों था गैरहाजिर?
चीन लंबे समय तक उत्तर कोरिया का सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है. लेकिन चीन वीटो में रूस के साथ शामिल होने के बजाय वोटिंग से ही दूर रहा. चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा, “राजनीतिक समाधान ही एकमात्र रास्ता है.” उन्होंने कहा, “(कोरियाई) प्रायद्वीप पर मौजूदा स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है. ऐसे में आंख मूंदकर प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता. इसके लिए राजनीतिक तरीके से कोई समाधान निकाला जाना चाहिए.”

चीन इसके पहले कई बार उत्तर कोरिया पर प्रतिबंधों में ढील देने का समर्थन कर चुका है. वोटिंग से पहले चीन ने रूस के प्रस्तावों का समर्थन भी किया था.
अब क्या बदलेगा?
एक्सपर्ट का कहना है कि उत्तर कोरिया पर प्रतिबंध लगातार अप्रभावी होते जा रहे हैं. इसके लिए मुख्य रूप से रूस और चीन ही जिम्मेदार हैं. 2019 के आसपास जैसे-जैसे वैश्विक प्रतिद्वंद्विता बढ़ती गई रूस और चीन ने संयुक्त राष्ट्र में प्रतिबंधों से राहत के लिए पैरवी करना शुरू कर दिया था.

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कोरिया इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल यूनिफिकेशन के होंग ने कहा, “उस समय रूस ने यूरोप में नाटो का पूर्व में विस्तार और पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी सेना की मजबूती का विरोध करने के लिए उत्तर कोरिया का इस्तेमाल किया था.”

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन के साथ ऐतिहासिक मुलाकात हुई थी. दोनों के बीत कई बैठकें भी हुईं, लेकिन इन बैठकों का कोई नतीजा नहीं निकला. पिछले साल तक एक्सपर्ट पैनल के को-ऑर्डिनेटर रहे एरिक पेंटन-वोक ने कहा, “रूस के वीटो का एकमात्र महत्व यह था कि आखिरकार पैनल और व्यापक प्रतिबंध व्यवस्था के प्रति रूस और चीन की वास्तविक स्थिति साफ हो गई.” एरिक पेंटन-वोक ने बताया, “जो लोग इस मुद्दे पर नज़र रखते हैं, उनके लिए एकमात्र हैरानी यह रही कि ऐसा पहले नहीं हुआ था.”
हाल ही में, उत्तर कोरिया ने संयुक्त राष्ट्र में गतिरोध का फायदा उठाने, मिसाइल परीक्षणों और हथियारों के विकास में तेजी लाने की ओर कई बड़े कदम उठाए हैं.

सियोल में यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कोरियन स्टडीज के चीफ यांग मू-जिन ने बताया, “अगर वॉशिंगटन इस स्थिति को बदलना चाहता है, तो उत्तर कोरिया के साथ सबसे अधिक बातचीत करने वाले चीन और रूस का सहयोग महत्वपूर्ण है.”

रूस-उत्तर कोरिया के रिश्ते अभी कैसे हैं?
उत्तर कोरियाई तानाशाह किम जोंग उन ने पिछले साल सितंबर में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी. इस दौरान जोंग ने कहा था कि रूस उनके देश के लिए “नंबर एक की प्राथमिकता” में है. इसके बाद दोनों देशों ने कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाया है. दक्षिण कोरिया ने इस महीने की शुरुआत में दावा किया था कि उत्तर कोरिया ने अब यूक्रेन के साथ युद्ध के लिए रूस को 7,000 कंटेनर हथियार भेजे हैं.

पुतिन और किम जोंग उन की मुलाकात क्यों इतनी चर्चा?

वैसे कोरोना महामारी के दौरान लगे प्रतिबंधों के कारण उत्तर कोरिया की सीमाएं अभी भी काफी हद तक बंद है, लेकिन रूस के लिए कोई मनाही नहीं है. रूसी पर्यटकों के एक समूह ने पिछले महीने प्योंगयांग का दौरा किया था. कोविडकाल के बाद उत्तर कोरिया में ये पहला ज्ञात विदेशी दौरा है. आधिकारिक कोरियन सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी ने कहा कि रूस के स्पाई चीफ भी इस हफ्ते प्योंगयांग का दौरा कर चुके हैं.
हडसन इंस्टीट्यूट में एशिया-प्रशांत सुरक्षा के चीफ पैट्रिक क्रोनिन ने ‘योनहाप’ न्यूज एजेंसी को बताया कि रूस का वीटो किम जोंग उन के लिए एक वास्तविक जीत है. उन्होंने कहा, “किम जोंग उन का क्रेमलिन (रूस के राष्ट्रपति का ऑफिस) से प्रेम रंग ला रहा है. उत्तर कोरिया अब रूस की मदद से अपने रणनीतिक हथियार कार्यक्रमों को धीमा किए बिना प्रतिबंधों को समाप्त करना चाहता है.”