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श्री कृष्ण के उपदेश देते हैं प्रेरणा

प्रदीप चौधरी 

स. सम्पादक शिवाकान्त पाठक

राष्ट्रीय अध्यक्ष जनकल्याण सेवा ट्रस्ट प्रदीप चौधरी ने ऐक भेंट वार्ता में कहा कि कुरुक्षेत्र की भूमि पर चचेरे भाइयों के बीच होने जा रहे महायुद्ध में एक तरफ कौरव और दूसरी तरफ पांडवों की सेना खड़ी थी। अपने सामने प्रतिद्वंदी शत्रु के रूप में खड़े परिजनों, गुरु और मार्गदर्शकों को देखकर अर्जुन के हाथ कांपने लगे। जिनके साथ उन्होंने अपना बचपन व्यतीत किया था, आज कैसे वो उन पर प्रहार कर सकते थे। जिन्होंने उन्हें एक सफल जीवन से जुड़ी हर शिक्षा प्रदान की, आज उन्हें अपने शत्रु के तौर पर समाप्त करना था।

यह विचार, आंखों के सामने का दृश्य और होने वाले परिणाम के बारे में सोच-सोच कर महायोद्धा अर्जुन भी अपने क्षत्रिय धर्म से विचलित होने लगे। वह किसी भी हाल में गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह और अन्य परिजनों पर अपना तीर नहीं डाल सकते थे।

अर्जुन ने अपनी स्थिति अपने सारथी और मित्र भगवान श्रीकृष्ण को बताई। ऐसे में अर्जुन के मानसिक द्वंद को शांत करने के लिए भगवान कृष्ण उनके उपदेशक भी बने। उन्होंने रणभूमि में अर्जुन को जीवन की वास्तविकता और मनुष्य धर्म से जुड़े कुछ ऐसे उपदेश दिए जिन्हें “गीता” में संग्रहित किया गया। हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तक गीता, भगवान श्रीकृष्ण के उन्हीं उपदेशों का संग्रहण है, जो उन्होंने महाभारत के युद्ध के दौरान अपने मार्ग से भटक रहे अर्जुन को प्रदान किए थे।

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