अंकित कायर नहीं, बस उसे पता है डर के आगे जीत नहीं FIR होती है
शायद हम भूल चुके हैं कि यह 21वीं सदी है अब अबला रही महिलाएं धरती पर ट्रेन चला रही हैं तो आसमान में प्लेन उड़ा रही हैं कुछ तो चांद तक जा रही हैं वहीं कुछ ऐसी भी है जो गा रही हैं कुंडी न खटकाओ राजा सीधे अंदर आओ राजा नमस्कार मैं हूं डॉ सुयश नारायण मिश्रा और आप देख रहे हैं समग्र चेतना। वीडियो में दिखने वाला अंकित कायर नहीं है, न ही बेचारा और कमजोर। बस समाज के डर और कानून की किताबों से इतना भयभीत है कि उसके लिए ‘स्वतंत्रता’ शब्द एक दंतकथा बन चुका है। शायद यही वजह है कि वह आज पती देव नहीं पति पीड़ित बनकर जी रहा है। क्योंकि उसको पता है कि डर के आगे जीत’ नहीं, FIR होती है अंकित की स्थिति गुलाम भारत जैसी है, बस बिना प्रतिकार के उसका घरेलू स्वतंत्रता संग्राम जारी है। जीत की कोई उम्मीद नहीं है फिर भी वह लड़ रहा है। बंद कमरे में पिटते अंकित का हथियार? न तलवार, न लाठी—बस एक मोबाइल फोन… ताकि वह इस समाज और कानून को अपनी बेगुनाही का सबूत दे सके।
पति अंकित का डर भी जायज़ है। उसे पता है कि अगर उसने बाहुबली बनने की ज़रा भी हिमाकत की, तो IPC की किताब से ऐसी धाराएँ निकाली जाएँगी कि वह घर से सीधा जेल तक पहुंच सकता है। थप्पड़ों की मार और मां से बचाने की गुहार तक, अंकित का यह वीडियो कोई रियालिटी शो का दृश्य नहीं, बल्कि रियल लाइफ का तीखा सच है। नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक यह वीडियो मध्य प्रदेश के सतना जिले का है। कोलगंवा थाना प्रभारी सुदीप सोनी के मुताबिक वायरल वीडियो पांच से छह महीने पुराना है। जिसमें दोनों पक्षों की तरफ से रिपोर्ट दर्ज है। साथ ही पत्नी ने पति अंकित पर भरण पोषण, मेंटेनेंस और डोमेस्टिक वायलेंस का केस भी किया है। ऐसे तमाम उदाहरण रोज़ाना देखने-सुनने को मिलते हैं।
फिर भी हम यह सोच नहीं पाते कि हिंसा का शिकार सिर्फ़ महिलाएँ नहीं पुरूष भी होते हैं। प्रतिशत भले ही कम हो, लेकिन पुरुष भी कहीं न कहीं उसी दर्द से गुजरते हैं। लेकिन हम उस समाज का हिस्सा हैं जहां यह मान लिया गया है पुरुष की आँख से गिरा आँसू आसूं नहीं पसीना होता है! जैसे गुरूजी ने बचपन में पाइथागोरस प्रमेय में लंब कर्ण और आधार में जो अंतर बताया वो हमने अपने दिमाग में फिट कर लिया। वैसे ही इस समाज ने मान लिया है कि अगर महिला अपने हक़ के लिए लड़ती है तो नारी सशक्तिकरण, लेकिन पुरूष अगर प्रतिकार करता है तो महिला उत्पीड़न। वह अलग बात है कि देश में न जाने कितनी महिलाएँ घरेलू हिंसा का शिकार हो रही हैं—कभी दहेज के नाम पर, तो कभी अशिक्षा के बहाने।
उनकी सुरक्षा के लिए कानूनों की कतार खड़ी है शायद यह जरूरी भी है, लेकिन अंकित जैसे पुरूष भी इसी समाज का हिस्सा हैं फिर भी इनके लिए कानून की किताब में कोई विशेषाधिकारी नहीं। क्योंकि हम एक ऐसे समाज का हिस्सा है जहां संवेदनाएं केवल लिंग के आधार पर तय की जाती हैं और सहयोग— सुविधाएं जाति के आधार पर। नमस्कार